Saturday, December 22, 2012

दाग अच्छे हैं

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मुझे इस बात का बड़ा गर्व था की मुझे कभी गुस्सा नहीं है। पर पिछले 1-2 महीनों  में अपने पूरी उम्र का quota पूरा कर लिया है। मुझे अब छोटी छोटी बातें भी irritate करने लगी है। मेरा मन अब स्थिर नहीं रहता। सहसा कोई भी ख्याल आ जाता है। कभी मैं अपने आप को दिल्ली में जॉब करता पता हूँ और कभी सुपरमैन की तरह एक ऊँची  सी इमारत के ऊपर। bike में बैठे बैठे मैं 1000 अधूरे सपनों को अक्सर पूरा होते देखता हूँ। खुश होता हूँ, उदास होता हूँ, और फिर ऑफिस आ जाता है।  ऑफिस एक ऐसी जगह है जो emotions सोख लेती है। शायद SM नहीं होती तो हम अब तक एक जिंदा लाश बन चुके होते। hollywood मूवीज के zombies  की तरह। लो! मेरा मन फिर भटक गया।

मुझे लगता है मेरी ज़िन्दगी अब मेरी नहीं रही। हाथ से निकल चुकी है। ठीक किसी काल्पनिक कहानी के उस पात्र की तरह जो सूरज ढलने से पहले एक यात्रा शुरू करता है और फिर कभी वापस नहीं आता।
कभी कभी सोचता हूँ की मेरी ज़िन्दगी का क्या मकसद है! चुपचाप करके ऐसे ही एक एक दिन काट लें। जैसे ज़िन्दगी न हो गयी, मौत का इंतज़ार हो गया।

अब शायद मुझे दूसरों की ख़ुशियों से जलन होने लगी है। facebook पे तो सब ख़ुश ही दीखते हैं। उम्मीद करता हूँ मैं किसी और दुनिया में हूँ। :)

मेरे चेहरे पर भी उम्र झलकने लगी है। कल ही किसी ने अपने नए डिजिटल कैमरे से photo लेके बताया। देख कितना क्लियर आता है इसमें। चेहरे के दाग सारे साफ़ दिख रहे हैं। "दाग अच्छे हैं" कहके मैंने बात टाल दी।

कभी सोचता हूँ ये ज़िन्दगी अगर दोबारा जी पता तो कैसी होती। फिर लगता है इस से बेहतर तो क्या होती।
मुझे येही माँ चाहिए होती। येही भाई बहन और तुम।

Thursday, December 6, 2012

तुम्हे तो पता है मेरी फोटो अच्छी नहीं आती

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तुम्हे तो पता ही है की मेरी फोटो अच्छी नहीं आती।
अच्छा!!! कभी मेरी आँखों में देखा है।
हाँ। पर वहां तो या उदासी होती है या मैं।
और नहीं तो क्या। जब तुम नहीं रहोगे तो उदासी ही रहेगी।

ह्म्म्म। शायद मेरी फोटो अब कभी अच्छी ना आये।

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अच्छी wine का असर देर से होता है।
जैसे तुम्हारी याद। अब जा के दर्द दे रही है।
और ये ख़ालीपन। जो अब भर नहीं रहा।
अब समझ में आयी तुम्हारी आँखों की उदासी।

मैंने किसी और की आँखों में देखा।
अब भी मेरी फोटो अच्छी नहीं आती।
ओह्ह। कसूर फोटो का नहीं मेरी आँखों का ही है।
न ये तब अच्छा देख पाए, न अब अच्छा देख पाएंगे।

Tuesday, November 6, 2012

नोक झोंक

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"मैं तुमसे? नहीं तो!!! क्यूँ? मैं क्यूँ करूँगा तुमसे?" उसके बार बार पूछने पे की मैं उस से प्यार करता हूँ मुझे कहना ही पड़ा। और वो फिर मूँह फूला के बैठ गयी। मुझे पता था ऐसा वो तभी करती है जब उसको थोडा नोक झोंक करने का मन करता है। उसे भी पता था की मैं ये जान जानबूझ कर कर रहा हूँ। पर कभी कभार प्यार है इसके एहसास की जरुरत होती है उसको। इसके बाद के सारे स्टेप्स एक रोबोट की भाँती follow होते हैं।
step 1: थोड़ी देर तक टेढ़ी आँख से उसको अपनी तरफ मुह फुलाए हुए तकते देखता हूँ। फिर "ठीक है बाबा करता हूँ।"
step 2: पक्का?
step 3: "हाँ बाबा पक्का।"
step 4: "कितना?"
step 5: "खूब सारा!"
step 6: "बहुत सारा वाला खूब सारा?"
step 7: "हाँ. बहुत सारा वाला खूब सारा."
step 8: हंसी ऐसे वापस आती है जैसे किसी ने बाँध का पानी छोड़ दिया हो। "फिर ठीक है।"


और फिर वो वापस अपने काम मैं लग जाती है। शायद ये उसका बचपन है जो चाहता है अपने बच्चों के साथ मैं भी उसे बच्चे की तरह ही प्यार करूँ।

तुम और शून्य

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तुम्हे पता है!!! मैं अक्सर फुर्सत लेके तुम्हें सोचता हूँ।  तुम्हें  शायद  अजीब लगता हो और शायद अजीब है भी। पर इसका भी अपना ही एक मजा है। वो ही मजा जो एक व्हिस्की का ग्लास ले के आराम से पीने मैं है  शायद वोही नशा तुम्हारी याद का है। मैं तुम्हारी याद के साथ कोई समझौता नहीं चाहता। इसीलिए जब तुम याद आती हो तो आराम से एक एक याद, याद करता हूँ।


जब तुम्हें याद करने की कोशिश करता हूँ तो मन एक टक शून्य में खो जाता है। समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ। शायद कुछ भी याद नहीं या बहुत कुछ याद करने को है। 

मुझे याद नहीं कैसे तुम्हारे बाल कभी कभी मेरे चेहरे को छू जाते थे, उनमे भीनी भीनी किसी शेम्पू की खुशबू थी जो थोड़े टाइम बाद मुझे अच्छे लगनी लगी। कौन सा शेम्पू था?
मुझे याद नहीं तुम्हारे साथ की गर्माहट मेरे वजूद को कैसे पूरा कर देती थी? मुझे तुम्हारी हथेलियों का आकार भी तो याद नहीं है। जाने कैसे वो मेरे हाथों में जगह बना लिया करती थी। जैसे पानी कैसे भी आकार ले लेता है, शायद वैसे ही  तुम्हारी  हथेलियाँ मेरी हथेलियों में समाँ जाया करती होंगी इतना पत्थरदिल मैं कैसे हो गया मेरे लिए भी ये surprise है जाने कैसे मैं भूल गया की जब तुम रोती थी तो क्या तुम मुझे गले से लगा लेती थी!!! जो मेरी शर्ट में नमी है वो तुम्हारे आँसू तो नहीं!!! क्या तुम्हारे दिल की धड़कन,जो रोते हुए मेरे सीने से महसूस  होती थी, क्या अब भी मेरे सीने में ही कहीं दफ़न है!!!

कुछ भी तो याद नहीं मुझे। सब शून्य है। तुम कौन हो, मैं कौन हूँ!

Saturday, May 5, 2012

अपने साथ जी के देखा है?

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कभी अपने साथ जी के देखा है? ओशो कहते हैं दिन मैं ऐक बार अपने से बात कर लिया करो, नहीं तो तुम दुनिया मैं सबसे बेहतरीन इंसान से बात करने का मौका चूक जाओगे... मैंने कई बार अकेले बैठ के देखा है... कारण कुछ नहीं था... बस ऐसे ही... कभी खुद से चाह के या कभी दुनिया की आपाधापी मैं थोडा पीछे रह गया... सोचा थोडा सोचूं क्या किया जो नहीं करना था... थोडा अपने से बातें कर लूँ... शायद कोई जवाब मिल जाये... जैसे फिल्मों मैं दिखाते हैं... शीशे के आगे हीरो अपने आप को धुतकारता है "you are such a stupid ______!!!" वैसे ही... पर नहीं मैं नहीं सोच पाता... जैसे ही सोचता हूँ तो वो ही बातें याद आती है, नहीं बातें नहीं गलतियाँ याद आती हैं और फिर आगे कुछ सोचा नहीं जाता... बस फिर बैठ जाता हूँ चुपचाप... ऐसा नहीं है की कुछ सोच नहीं पता, बस भाग जाता हूँ अपने आप से... हमेशा की तरह... छुप जाता हूँ अपने ही इंसानी खोल के अन्दर ऐक आई डोंट केयर का attitude ले के...

फ़र्ज़ करो तुम और तुम दो अलग अलग इंसान ऐक ही कमरे मैं बैठे हो... क्या बात करोगे?
दोनों ऐक दुसरे के बारे मैं सब कुछ जानते हो... क्या करोगे? नज़रें चुराओगे या मिलाओगे? शायद चुप ही रहोगे... मेरी तरह...

Saturday, March 31, 2012

पहचान लिया श्रीनगर ने मुझे पर शायद मैं ही ना पहचान पाया

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मैं आया था वापस श्रीनगर और श्रीनगर तुमने मुझे पहचान ही लिया तुरंत... लगा लिया मुझे अपने गले से जैसे कई बरस मिलने के बाद कोई माँ अपने बेटे को सीने से लगा लेती है... पर मैं ही ना पहचान पाया तुम्हे... मेरा कसूर नहीं है इसमें, बरस भी तो काफी बीत गये हैं... जैसे भूल जाता है कोई बच्चा अपने बचपन के चेहरे, मैं भी भूल गया तुझे... पर अब धीरे धीरे बूढी लकीरों के पीछे से तेरी आँखों की चमक याद आ रही है मुझे... कितना बदल दिया है तुमको शायद विकास के लिए या शायद बदलाव संसार का नियम है, उस नियम की खातिर... कैसे पहले जब भी मैं नदी की तरफ आता था स्कूल से भागकर तो लहरों की आवाज़ दूर से ही सुने देती थी जैसे बुला रही हो मुझे... मैं फिर से भाग कर आया पर इंतज़ार करता रहा आवाज़ का की अभी बुलाएगी ये नदी मुझे... फिर से मैं बचपन जियूँगा...  पर अब वो आवाज़ दब गयी है कहीं विकास के शोर मैं... घरों क बीच से होते हुए मैं वापस नदी से जा मिला... घंटों बैठा रहा, बातें करता रहा... मैंने सुनाई अपनी कहानी उसे, कभी खुशी के किस्से तो कभी दुःख के, कभी कुछ पाने की कहानी और कुछ खोने की... उसने भी कल-कल करते सारी बातें सुन ली, अपने पास बिठाया, मेरे पैरों पे ठंडा पानी लगाया... पुछा, अब आराम है? मैंने कुछ नहीं कहा बस देखता रहा शून्य मैं... उसने भी फिर कुछ नहीं कहा... बस मेरे पास बहती रही... चुप चाप... शायद वो भी रो रही होगी पर कल कल आवाज़ के सिवा और क्या कह सकती है वो... बस सहलाती रही पाऊँ को... और समेटती रही सारे दुःख सारी पीड़ा... पर श्रीनगर मैं पहचान भले ही ना पाया हूँ पर भूला नहीं तुझे... मैं आज भी लौट के आया हूँ और आता रहूँगा...